रोना क्यों – Zindagi me kabhi rona nahi chaiye

रोना क्यों-  Zindagi me kabhi rona nahi chaiye :दोस्तों सभी की ज़िन्दगी में दिखाते आती कोई रो के काम कर  लेता हैं | और कोई उसे हंस कर भुला देता है पर जब हमे पता है, की ज़िन्दगी में ख़ुशी और  दोनों हमे ही जीने है तो रोना क्यों ?

आज में आपको एक कहने बताने जा रहा हूँ | कुछ सूफी संतों राबिया लोगों की जगह को बहुत ऊंचा मानते थे | क्योकि  वे अपना जीवन बड़ी सादगी से जीना पसंद करते थे उनमें से एक सूफ़ी संत बहुत प्रसिद्ध था और वह ईश्वर में बहुत श्रद्धा रखता था |

Zindagi me kabhi rona nahi chaiye
                      Zindagi me kabhi rona nahi chaiye

उसने सब कुछ अपना भगवान को सौप रखा था| एक दिन उस के पास एक व्यक्ति आया उसके माथे पर पटी बंधी थी तब उसने पूछा क्यो भाई किया होगया ? यह माथे पर पटी क्यो बंधे हों |

तब उस ने बोला = मेरे सर  दर्द हो रहा है  पटी बंधा हूँ |

तब फिर उसे पूछा गया : तुम्हारी उम्र कितनी हैं ? वह बोलता है लगभग ३५ साल की हैं |

तब वह बोलते है ठीक है अच्छा ये बताओ इतने साल में तुम ठीक तहे या बीमार थे ?

वह आदमी थोड़ा सोच के बोलता है में हमेशा तंदरुस्त रहा हूँ | .

तब वह संत बोले -: तुम इतने साल तंदरुस्त रहे पर तुमने एक भी दिन इसके सुख में पटी नहीं बंधी और आज जरा सा सर दर्द होने मर पटी लगा ली |

संत  कर वह बहुत सर्मिन्दा हुआ और बिना कुछ बोले सर जुखा के चला गया |

दोस्तों ये बात हमे बहुत छोटी लगती है पर इसका यहाँ मतलब नहीं है | इसका यहाँ मतलब है की सुख में तो हम भगवान को कभी याद नहीं करते और जैसे ही हमे कोई दुःख होता है हम सीधे भगवान के पास अपना रोना लेकर पहुँच जाते हैं |

दोस्तों ये कहानी  रोना क्यों-  Zindagi me kabhi rona nahi chaiye आप को कैसी लगी मुझे कम्मेंट कर के जरूर बताये | 

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